Monday, September 19, 2011

एक दर्द भरी प्रेम कहानी, भाग-५

[देरी के लिए क्षमा मांगता हूँ मित्रो| माफ़ कर दो, लो मैं आ गया-]
पूर्वापर-
दूबे के चंगुल से छूटी  हुई आरती और दीपक में प्यार हो गया, और अपना दीपक उसके पीछे पीछे नेपाल तक चला गया | मगर आरती ने जो पता दिया था, वो गलत निकला| गयी तो कहाँ गयी??-
ज़िन्दगी 
१.
दीपक और प्रकाश ने पढाई पे ध्यान देने का नाटक किया| जी हाँ प्रकाश ने भी| क्योंकि पढाई उसके लिए एक खेल ही था| वैसे भी वो क्लास का टोपर था, तो कुछ सोचना तो था नहीं| अपने दीपक के पढाई की लग गयी थी, पूरी तरह से| किसी तरह खींच के नैया पास-घाट तक लगी| नेट की परीक्षा के लिए आवेदन दिया तो प्रकाश ने दीपक को कहा- "बेटे तुमको एक बात बोलनी थी|"
दीपक ने हरिश्चंद्र घाट पर जलते हुए एक चिता की लपटों को देखा और बोला- "क्या?"
"पहले इधर देख..., उसको देख के क्या फायदा जो जा चुका है?"
दीपक हँसते हुए बोला- "चल बोल क्या बोलना है|" इस बार वो प्रकाश को देख रहा था|
"तुझे पता है न कि तुने अपनी जिन्दगी की मार ली है..."
"हाँ तो?"
"तो ये कि अब तेरे पास जो कुछ बचा है, समेट; और इस मायाजाल से निकल जल्दी से|" दीपक सचमुच प्रकाश का मुंह ताकने लगा|
प्रकाश बोलता रहा-" तूने भी दर्शन पढ़ा है मेरे भाई, अच्छी तरह जानता है तू कि इंसान इच्छाओं के भावारजाल में फंसा रहता है| कभी कभी कुछ इच्छाएं कर लेता है, जो पूरी नहीं हो सकती| किसी हाल में नहीं| तो इसका ये मतलब तो नहीं कि उन इच्छाओं को पकड़ के बैठ जाना चाहिए!!?!! तेरी अपनी कोई ज़िन्दगी भी है यार, और तेरे माँ-बाप भी हैं, और उनकी भी तो इच्छाएं हैं जो तुझसे जुडती हैं....! तू समझ रहा है, मैं क्या कह रहा हूँ?"
"हाँ! समझता हूँ|" दीपक रुआंसा होता हुआ बोला| प्रकाश ने कोई ध्यान नहीं दिया और उठ कर खड़ा हो गया-"तो फिर तैयार रह, ये तेरा आखिरी मौका है; ऐसा समझ और सच में इस परेशानी से निकल, क्योंकि ये इच्छा कभी पूरी नहीं हो सकती..."
दीपक ने भी खड़े होना शुरू किया- "गलत!"
"क्या गलत?"
दीपक खड़ा हो गया- "आपने ही एक बार कहा था महाप्रभु कि आज तक ऐसी कोई इच्छा ही नहीं बनी जो पूरी न होती हो..." प्रकाश कुछ और कहना चाहता था, मगर दीपक बोलता रहा-"घबरा मत! नेट निकाल लूँगा मैं" और प्रकाश को इस तरह से देखा कि वो हंस पड़ा- "साला नौटंकी"


२.
नेट कि परीक्षा तो दोनों की निकली और बाबा विश्वनाथ की कृपा से दीपक को प्रकाश से भी अच्छे नंबर आये| प्रकाश ने सेंट्रल हिन्दू कॉलेज, वाराणसी में व्याख्याता का पद प्राप्त कर लिया| दीपक को भी अलीगढ और नयी दिल्ली से बुलावा मिल गया था, मगर अचानक एक दिन बोला- "यार! मैं घर जा रहा हूँ| मैं ये सब नहीं करूँगा, पिताजी का ऑफिस ही संभालूँगा| अपना बिजनेस ही ठीक है|"
प्रकाश ने एक मिनट चुप रह के सोचा-'ठीक ही है, माँ-बाप के पास रहेगा तो उनकी इच्छाओं को समझ सकेगा; और पैसे की तो इसको कभी कमी रही नहीं| योग्य है, आगे भी नहीं रहेगी.'
"ठीक है! जैसा सोचा है वैसा कर..."
हालाँकि उसको मन कर रहा था कि ऐसा बोले-' जैसी इच्छा है वैसा कर...' मगर उसकी इच्छा वो जानता था, जो बड़ी गन्दी सी और दुखदायी सी थी|

रेलवे स्टेशन पर बिछड़ते समय दीपक की आँखों में दो बूँद आंसू आ गए| प्रकाश के गले लगा और बोला-"भाई, कहते हैं की काशी की गली में बाबा घूमते रहते हैं| कभी मिल जाएँ, तो पूछना की मेरे साथ ऐसा क्यों किया|"
प्रकाश हँसते हुए बोला-"साले! पूछूँगा क्यों? बाबा मिलेंगे तब तो पहले मैं अपनी मुक्ति का उपाय पूछूंगा| तू अच्छे से रहना और फ़ोन करना|"

प्रकाश की शादी तय हो चुकी है और अगले महीने शादी है| दीपक का बिजनेस अच्छा चल रहा है| उसको भी शादी में बुलाया है| सपरिवार| देखिये सब के साथ जाता है कि  अकेले? कहानीके अगले भाग में- 

एक दर्द भरी प्रेम कहानी, भाग-६ 

मुझे गालियाँ मत दो दोस्तों! कहानी लम्बी है तो मैं क्या करूँ? बदल नहीं सकता...


Friday, September 16, 2011

Reloaded.......

 लगता है ये ब्लॉग फिर से जिंदा करना पड़ेगा,
मेरे दोस्तों को बहुत पसंद आ रहा था, मैंने बेकार ही बीच में छोड़ दिया. 
मैं फिर से आ रहा हूँ दोस्तों, इंतज़ार करिए.

Wednesday, March 3, 2010

Ek dard bhari prem kahani- 4

एक दर्द भरी प्रेम कहानी. भाग- 4.
एकबारगी तो लगा कि ये कहानी अधूरी ही रह जाएगी.
मगर आज अचानक टाइम मिल गया.
तो एक रि-कैप हो जाये-
गंगा किनारे दीपक आरती से मिला, दोनों ५ दिनों तक एक ही मकान में रहे, मगर अलग अलग. दोनों को एक दुसरे से प्यार हो गया. और अपने दोस्त प्रकाश के समझाने पर आखिर दीपक ने आरती से अपने दिल कि बात कह ही दी. आरती ने जाने से पहले दीपक को एक कागज़ का टुकड़ा दिया- " इसे घर जाकर पढना."   अब आगे---

१. दीपक और प्रकाश देर रात तक बाहर ही रहे. प्रकाश ने दीपक को शास्त्री जी से मिलवाया और दोनों ने शास्त्री जी से पढाई पर चर्चा की. रात को ११ बजे दीपक अपने कमरे पर पहुंचा. साथ में वह कागज़ का टुकड़ा भी था, जो शाम को आरती ने दिया था. दीपक ने जेब में से वह टुकड़ा निकला और पढने लगा-
११/०२,
सेक्टर- C ,
गोरखनाथ मार्ग,
बीरगंज.
 दीपक ने प्रकाश को अगले सुबह वो कागज़ दिखाया. " यार, ये तो उसके घर का पता लगता है." प्रकाश ने कहा.
" ये तो मुझे भी पता है, मगर ये बता; इस पते पर पहुंचा कैसे जाए?"
" पागल हो गया है. तू नेपाल जाएगा!? वीसा, पासपोर्ट वगैरह कुछ भी है तेरे पास?"
" नहीं है. मगर इन सब के बनने में कितना वक़्त लगेगा?"
और दोनों ने पासपोर्ट के लिए आवेदन दे दिया. लगे हाथों वीसा भी बनवाने लगे. ले दे के पासपोर्ट तो बन गया. तभी एक दिन दीपक को ध्यान आया- " अबे प्रकाश. नेपाल जाने के लिए वीसा की क्या जरूरत है?"
" बेटा, जरूरत तो कोई नहीं है. मगर मैं कोई रिस्क नहीं लेना चाहता. शायद तुझे पता नहीं, कि मोगाम्बो कितना बड़ा अमरीशपुरी है. वो खड़े खड़े हम लोगों को अन्दर करवा देगा. इसलिए सोच समझ के गेम खेल ."

२. सारे कागजात बनवाते बनवाते एक साल बीत गया. और फिर दीपक और प्रकाश ने गर्मियों कि छुट्टी में रक्सोल की बस पकड़ी. रक्सोल में दोनों ने शास्त्री जी के लड़के अनुपम के घर पर डेरा डाला, जो वहां नारकोटिक इंस्पेक्टर के पद पर काम करता था. अगले दिन सुबह दोनों पैदल ही नेपाल के लिए रवाना हुवे. सीमा पर उनकी चेकिंग हुई. फिर दोनों बीरगंज पहुंचे.
११/०२,
सेक्टर- C ,
गोरखनाथ मार्ग,
बीरगंज.
ये पर्ची हाथ में लिए, दोनों इधर उधर घूम रहे थे. एक रिक्शा वाला मिल गया, जो गोरखनाथ मार्ग को ही जा रहा था. उसने दोनों को बिठाया, और बोला- " रोड पर पहुँचाने का ३० रूप्या, घर तक पहुँचाने का ४५ रूप्या."
दोनों घर पर पहुंचे. दरवाजे पर बड़ा सा ताला लगा था. पडोसी से पूछने पर पता चला- " कोन आरती? इधर तो कोई आरती नहीं रहते हैं साब जी. इस घर में तो ५ साल से कोई नहीं रहते. पहले केदार नाथ सिंह जी रहते थे, अपनी लुगाई अऊर दो लड़कों के साथ. अभी वो जनकपुर में रहते हैं. तब से ये घर खाली ही है."

३. दीपक और प्रकाश ने ढूंढने के कड़ी कोशिश की. अनुपम शास्त्री को भी जानकारी दे दी. उसने भरोसा दिलाया कि वो अपने नेपाली लिंक से आरती के बारे में पता लगाने की कोशिश करेगा. और हमारे दोनों दोस्त बैरंग वापस आ गए. दीपक को उदास देख कर प्रकाश ने कहा- " चल! इसी बहाने पासपोर्ट तो बन गया न. अब विदेश जाने के लिए ज्यादा मसक्कत तो नहीं करनी पड़ेगी न-"
दीपक ने गंगा की लहरों में देखते हुए कहा- " मगर, उसने मुझे गलत पता क्यों दिया. क्या उसे नहीं मालूम था कि उस मकान में ५ साल से कोई नहीं रहता?"
प्रकाश ने भी गंगा मैया के लहरों को देखते हुए कहा- " भूल जा यार. वो बस एक चैप्टर थी. अभी अपने पास पूरी जिंदगी की किताब पड़ी है. भूल जा."
" हूँ...."

 
आगे क्या हुआ? क्या आरती मिली? उसने गलत पता क्यों बताया था?
इन्तेजार करिये- 
एक दर्द भरी प्रेम कहानी, भाग- ५ का.
तब  तक के लिए- नमस्कार.

Monday, September 21, 2009

beetal ka sangeet

नमस्कार मित्रों!
मैं पिछले दिनों एक बड़े ही सुन्दर चीज के पीछे पड़ा था. 


वो चीज थी साठ और सत्तर के दशक के महान संगीत- बैंड बीटल का संगीत. 
सबसे पहले तो मैंने अचानक ही यू-ट्यूब पर एक विडियो देखा जिसमे बीटल्स का प्रसिद्द गीत "यू गोट टू हाइड यौर लव अवे " दिखाया गया था. 
मैं पूर्ण रुपें भारतीय हूँ. एक छोटे से शहर में पला-बाधा, हिंदी फिल्मों के गानों और पंचम-दा, किशोर कुमार, मुकेश, रफी, रहमान, लता और श्रेया घोषाल के  अलावा और कुछ भी नहीं जानता था. मगर इन्टरनेट कि कृपा से अचानक पिछले महीने बीटल के संनिद्धि में आ गया.
           यद्यपि बीटल अमरीकन हैं, फिर भी उनके संगीत में कहीं न कहीं भारतीयता जरूर झलकती है. खास कर जोर्ज  हेरिसन का संगीत कई मायनों में भारतीय है. उनके कई गीत भी भारतीय संस्कृति और आध्यात्म से प्रेरित हैं. हेरिसन का पहला गाना जो मैंने सुना था, वो था- "दिस सोंग". यह गाना उन्होंने अपनी शुरूआती दिनों में तब बनाया था, जब उनके सुप्रसिद्ध गाने- "my स्वीट लोर्ड" को अमरीका के कुछ परंपरा वादी लोगों ने अदालत में घसीटा था, और उनके sarwjanik गाने पर paabandi lagaai गई थी. जब हेरिसन ने वह mukadma jeet लिया, तब उन्होंने "दिस सोंग" naamak गीत बनाया. यह गीत sunne के बाद मैं "my स्वीट लोर्ड" sunne के लिए प्रेरित हुआ. 
इस गाने को sunne के बाद मुझे पता चला कि हेरिसन asal में iskcon के sadasya then, और भारत के महान sant श्री bhaktivedant swami से बहुत prabhavit थे. prasangvash, श्री swami ने अमरीका में hindu darshan और vaishnay sampraday का jabardast prachaar किया है. उन्होंने ही 'antar-rashtriya krishna bhaawnaamrit sangh'(International Society of Krishna Consciousness- ISKCON) की sthapna कि थी.
बीटल के अन्य sadasy, jon lenan, sir paul mac-kartani tatha ringo star भी भारत से atyant prabhavit थे. उनके aadhyatmik guru maharshi yoganand थे. जब बीटल भारत कि yaatra पर था, तब haridwaar में maharshi के ashram पर उन्होंने अपने सुप्रसिद्ध गीत- "across द universe" की rachna की थी. 




(इस बार post prakashit करना kathin हो गया है, kyoni ब्लॉगर में कोई pareshani uttpan हुई है. और यह roman aksharon को devnaagri में बदल नहीं पा रहा है.)

Thursday, August 27, 2009

कविता

हे कविते, तू कितनी सुंदर?

शब्द, छंद और अलंकार
के आभूषण से रची बसी तू।
तुकबंदी अरु अतुकांत के भेद-अभेद में खसी खसी तू।

कभी वीर के रगों में बनकर लहू दौड़ती,
कभी कामनी के अधरों पे रस सी ठौरती;
कभी कर्म में लगे जीव की शान्ति प्रदाता-
कभी धर्म में देवो के यज्ञों में गूंजती।

तू कवि की कल्पना, अल्पना, जीवन-संगिनी,
फ़िर भी क्यो, भाषा, शब्दों, वाक्यों की बंदिनी?

तू तो ह्रदय का गान है,
महत का तू ही ज्ञान है,
तू निज का अभिमान है-
हरि की प्रिय संतान है।

फ़िर क्या डरना, इस जगती के रूपों से,
दिशा, काल और स्थिति के स्वरूपों से-
हर पल उसका गान कर, जो तेरा सम्राट है।
जो हरि, तुझमे, मुझमे, सबमे, सबसे परे विराट है।
जिस से मिलके गिद्ध, अजामिल, गणिका, गज भी मुक्त हुए।
उसके ही प्रेम में तेरे सहज पद्य भी सूक्त हुए।

तो फ़िर चल मैं उस प्यारे से प्यार करूँ।
और उसी के प्यारे शब्दों से तेरा श्रृंगार करूँ।
जिसके शब्दों के प्रताप से पत्थर सागर में तरे
आज उसी के नाम-गान में आ, हम दोनों चरे।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥

- प्रिय रंजन।

Saturday, August 1, 2009

एक कविता.

सावन तेरे इन्तजार में।
भूले बिसरे दिन मेरे जो बीते तेरी छम छम में।
वो नदिया, वो खेत हरे जो भीगे तेरी रिम झिम में।
तेरे आने से जो सारे चेहरे खिल जाते थे
तेरी बूंदों से भीग के बूटे बूटे मुस्काते थे,
तू आता था तो बच्चे सडको पे जहाज बहाते थे-
तेरे लय में मिल के नर नारी मलहार सुनाते थे।
तेरा बादल, तेरी बरखा, तेरा पवन सुहाना था।
पत्ता पत्ता, खेत, गली, अग- जग तेरा ही दीवाना था।
पिछले बरस ही तू आया था, पर लगता है युग बीत गए।
सावन तेरे इन्तजार में, इस साल हम रीत गए।

प्रिय रंजन

Sunday, May 3, 2009

एक दर्द भरी प्रेम कहानी, भाग-३.

पूर्वापर
दीपक और प्रकाश ने गंगा के घाट पर आरती की जान बचाई। दुबे को पुलिस पकड़ के ले गयी। अगले पाँच दिनों तक आरती दीपक के मकान मालिक श्री पाण्डेय जी के घर पर रुकी। चौथे दिन आरती के चाचा श्री यादव जी आ गए। दीपक आरती से प्रेम करता है। शायद आरती भी दीपक से प्रेम करती है। मगर दीपक ने आरती से कुछ कहा नही है। प्रकाश दीपक को कहता है की आरती को अपने दिल का हाल सुना दे। अब आगे-
बिछड़ने का दिन।
आज पांचवा दिन है। आरती शनिवार को मिली थी। आज शुक्र वार है। पूरे सप्ताह में दीपक के दिल की दुनिया ही बदल गयी है। दीपक सोच भी नही पा रहा है कि आरती के वापस चले जाने के बाद उसकी जिंदगी कैसे बीतेगी। सुबह में जब प्रकाश उसे कॉलेज ले जाने के लिए आया, तो उसने तबियत ख़राब होने का बहाना बनाया। प्रकाश ने कहा- "बेटा मैंने कहा था न कि ऐसी बातें दिल में रखना स्वास्थ्य के लिए बुरी हैं। मैं चलता हूँ कॉलेज। २ बजे आऊंगा। ५ बजे ट्रेन है। अभी १० बज रहा है। तेरे पास ४ घंटे हैं। बोल डाल। फ़िर मैं तुझे मेरे कंधे पर सर रख के रोने नही दूंगा। ओ के । "
दीपक हंसा- " हा हा । ठीक है यार। तेरी बात मान ली।"
दिन के १२ बज रहे थे। मोगाम्बो (यादव जी) पाण्डेय जी के साथ बनारस के बाज़ार से कुछ खरीदारी
करने गए थे। अब शौक है भाई। नीचे आरती अपना सामान पैक कर रही थी। ऊपर दीपक अपने कमरे में बैठा किताब पढने कि कोशिश कर रहा था। अचानक नीचे से रोने धोने कि आवाज़ आने लगी। दीपक ने ध्यान दिया। उषा कहा रही थी- "आरती दीदी, मुझे जाके भूल मत जाना। टेलीफोन करना।" दीपक ने वापस किताब पर ध्यान दिया- 'लड़कियां!'

१ बजे के करीब आरती अपना सूखता हुआ दुपट्टा लेने के लिए छत पर आई। दीपक ने किताब के कोने से देखा-' क्यों हो इतनी सुंदर? क्या मेरे पिछले जन्मो के पापो कि सज़ा देने के लिए इश्वर ने तुम्हे इतना सुंदर बनाया है? तुम चली जोगी, फ़िर मैं कैसे जियूँगा ? तुम्हे अंदाज़ भी है? ऐसा मुखडा, ऐसा स्वरुप, ऐसी आंखे, ऐसी आवाज़, ऐसे होंठ, क्यो लेके आई हो तुम? आई तो आई। अब जा क्यो रही हो? एक बार भी मुझ पर तरस नही खाया। कम से कम ही पूछ ही लेती- "मेरे प्राण प्रिये! क्या मैं चली जाऊं?" फ़िर मैं तुम्हे हाथ पकड़ के रोक लेता। देख लेता मैं दुनिया को और तुम्हारे मोगाम्बो को।' इतना सोचते ही दीपक के होंठो पर मुस्कान खेल गयी। उसने देखा। आरती अपने दोनों सूखे हुए दुपट्टे हाथ में लेके उसकी ही तरफ़ आ रही है।
"नमस्ते दीपक जी।"
"नमस्ते। आइये बैठिये।" दीपक ने कुर्सी छोड़ दी और ख़ुद बिस्तर पर बैठ गया।
"नही मैं बैठने नही आई हूँ।"
"तो------"
"मैं बस आपको विदा कहने आई हूँ। एक घंटे में चाचाजी और प्रकाश जी आ जायेंगे। फ़िर हम चले जायेंगे।''
''अरे रे। मैं भी तो आऊंगा न स्टेशन पर छोड़ने---"
"नही। वो तो है। मगर मैं आपको थैंक यू बोलना चाहती थी........."
"थैंक यू--!?"
"आपने मेरी इतनी मदद की। एक अंजान के लिए कौन करता है इतना सब ---"
'मैं अंजान! मैं तो हजारों सालों से तुम्हारा हूँ--' "नही, नही। इस में थैंक यू कि क्या बात है? ये तो मेरा फ़र्ज़ था-"
"अच्छा तो मैं चलती हूँ--"
"इतनी जल्दी-" "नही, मैं तो नीचे जा रही हूँ।" आरती को दीपक कि बेचैनी देख के हँसी आ गयी। उसकी मुस्कराहट देखकर दीपक ने होश खो दिए-' दीपक के बच्चे। देख वो भी तुझ से प्यार करती है। क्यो ख़ुद भी जल रहा है, और उसकी जान से भी खेल रहा है। बोल दे। बोल दे। बोल दे।'
आरती वापस मुडी और सीढियों कि और जाने लगी। 'बोल दे दीपक। बोल दे।'
आरती सीढियों के कमरे में आ गयी। तभी दीपक ने पीछे से पुकारा- "आरती।"
आरती पीछे मुडी -"हा। कहिये--"
"आरती मैं तुम्हे कुछ कहना चाहता हूँ।"
"क्या?" आरती खड़ी ही थी। दीपक उसकी तरफ़ बढ़ा। "मैं--"
"जी!??" आरती ने दीपक को बड़ी उम्मीद से देखा। दीपक ने इधर उधर देखा। आरती के एकदम पास आ गया। "मैं तुमसे--" "मुझसे क्या-?"
[प्रकाश कि छवि फ़िर प्रकट हुयी-'कुत्ते की औलाद। अगर अभी नही कहा तो मैं तुझे गंगा में फेंक दूंगा और तेरे गले में पत्थर फ्री में बाँध दूंगा। बोल दे।] "मैं तुमसे प्यार करता हूँ।"
आरती के आँखों में दो बूंद आ गए। दीपक को लगा की उसके पेट में से कुछ निकल गया है। उसने अपने मुंह को अचानक बंद कर लिया। दोनों होंठ अन्दर को भींच लिए। आरती खड़ी रह गयी। कुछ सेकंड ऐसे ही बीत गए। आरती ने खामोशी को तोडा-"मैं भी--"
दीपक खुश होने लगा। उसका मुंह खुलने लगा। "मैं जा रही हूँ। बाय।" कह कर आरती नीचे की और दौड़ गयी। उसकी चाल में एक नयी तेज़ी और नयी मस्ती थी। वो खुश थी। दीपक का मुंह खुला का खुला रह गया। उसने अपने दोनों हाथ अपने कमर पर रखे। एक बार नीचे देखा। फ़िर आरती को देख के एक नटखट सी हँसी निकली-"हः।"
स्टेशन पर।
स्टेशन पर दीपक था। आरती थी। पाण्डेय जी थे। यादव जी थे। प्रकाश था। चाची जी और उषा भी थे। पूरा काफिला आया हुआ था। प्रकाश ने घड़ी देखी "ट्रेन आने में अभी आधा घंटा है। यार दीपक चल जरा बाथरूम हो आए।" "ठीक है चल।" हालाँकि दीपक का मन आरती को छोड़कर (जो लगातार उषा से चिपकी हुई थी) जाने का नही था; मगर फ़िर भी वो प्रकाश के साथ चल दिया। दोनों बाथरूम से निकल के प्लेटफोर्म पर ही टहलने लगे। "तो, बोला की नही!" प्रकाश ने एक पानी की बोतल खरीदी। "क्या बोला-?" दीपक जानता था की प्रकाश क्या पूछ रहा है?
"अबे अब तो स्टाइल मत मार।"
"-" कुछ देर दोनों चुप रहे। दीपक ने अपने दोनों हाथ पैंट के पॉकेट में डाले और कंधे उचकाए-"हा। बोल दिया।"
"क्या बोला?"
"यही कि 'मैं तुमसे प्यार करता हु . '"
"अबे साले ये क्या बोल गया तू? तू मुझसे नही आरती से प्यार करता है। गे कही का!" दीपक ने पटरी की ओर एक कुल्ला फेंका। दीपक को हँसी आ गई-"अरे यार, मैंने उस से कहा की मैं उस से प्यार करता हूँ।"
"हाँ तो ऐसे बोल न। indirect स्पीच में।- फ़िर क्या हुआ?"
"फ़िर क्या हुआ क्या ?---"
"उसने कुछ कहा।??"
"हा- यही कहा की मैं भी-"
"तू भी क्या?"
"अरे यार, मैं नही वो।"
"अच्छा!!"
"उसने कहा कि वो भी।"
"वो भी क्या?"
"अरे उसने बस इतना ही कहा कि वो भी। और फ़िर चली गयी."
"ले, तुझे आधे पर छोड़ गयी; कम से कम पप्पी झप्पी तो लेना था यार . "
आरती बातें तो उषा से कर रही थी। मगर उसकी निगाह दीपक पर ही टिकी थी। तभी ट्रेन आ गयी। यादव जी और आरती को अपनी सीट मिल गयी। सब लोग ट्रेन के अन्दर ही बैठे थे, बस उषा और चाची जी बाहर प्लेटफोर्म पर थे । आरती ने दीपक से कहा-"दीपक जी। मुझे ठंडा पानी लेना है। कहा मिलेगा?" उसने एक बोतल निकाला। दीपक ने कहा- "मुझे दीजिये; मैं लाता हूँ।"
"नही, मैं भी चलती हूँ। जरा हवा में जाने का मन कर रहा है।" मोगाम्बो उस समय मोबाइल पर किसी से बातें कर रहा था। आरती और दीपक ट्रेन से निकले और प्लेटफोर्म पर आ गए। प्रकाश पाण्डेय जी को कहने लगा- "चाचा जी, अब आप लोग निकलिए। या फ़िर कम से कम चाची और उषा को भिजवा दीजिये। साढ़े ५ बज गए हैं, और ट्रेन ६ बजे के पहले नही खुलेगी। दीपक और आरती पानी के नल की ओर टहलने लगे। आरती ने नल से ठंडा पानी भरा। बोतल बंद किया। और अचानक दीपक को कहा-"मैं आपको कुछ देना चाहती हूँ। हाथ लाइए . "
"क्या है?"
"नही, पहले हाथ बढाइये।"
दीपक ने अपना हाथ बढाया। आरती ने अपने समीज के पॉकेट से एक कागज का टुकडा निकला। "इसे घर जाकर पढ़ लेना।" इतना कह कर आरती फ़िर वापस मुडी और तेज क़दमों ट्रेन की तरफ़ चली गयी । मन्त्र मुग्ध सा दीपक उस कागज को अपनी जेब में डाल कर उसके पीछे पीछे चल दिया।
आगे क्या हुआ जानने के लिए पढिये -
एक दर्द भरी प्रेम कहानी, भाग-४